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उषा प्रियंवदा

गजाधर बाबू ने कमरे में जमा सामान पर एक नज़र दौड़ाई -- दो बक्से, डोलची, बालटी -- ''यह डिब्बा कैसा है, गनेशी?'' उन्होंने पूछा। गनेशी बिस्तर बाँधता हुआ, कुछ गर्व, कुछ दु:ख, कुछ लज्जा से बोला, ''घरवाली ने साथ को कुछ बेसन के लड्डू रख दिए हैं। कहा, बाबूजी को पसन्द थे, अब कहाँ हम गरीब लोग आपकी कुछ खातिर कर पाएँगे।'' घर जाने की खुशी में भी गजाधर बाबू ने एक विषाद का अनुभव किया जैसे एक परिचित, स्नेह, आदरमय, सहज संसार से उनका नाता टूट रहा था।
''कभी-कभी हम लोगों की भी खबर लेते रहिएगा।'' गनेशी बिस्तर में रस्सी बाँधते हुआ बोला।
''कभी कुछ ज़रूरत हो तो लिखना गनेशी! इस अगहन तक बिटिया की शादी कर दो।''
गनेशी ने अंगोछे के छोर से आँखे पोछी, ''अब आप लोग सहारा न देंगे तो कौन देगा! आप यहाँ रहते तो शादी में कुछ हौसला रहता।''
गजाधर बाबू चलने को तैयार बैठे थे। रेल्वे क्वार्टर का वह कमरा, जिसमें उन्होंने कितने वर्ष बिताए थे, उनका सामान हट जाने से कुरूप और नग्न लग रहा था। आँगन में रोपे पौधे भी जान पहचान के लोग ले गए थे और जगह-जगह मिट्टी बिखरी हुई थी। पर पत्नी, बाल-बच्चों के साथ रहने की कल्पना में यह बिछोह एक दुर्बल लहर की तरह उठ कर विलीन हो गया। Listen Audio Playback click here or

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Saturday, 29 September 2012

मनुष्यता कविता का अनुवाद

हिंदी अद्यापक श्री. फ्रान्सी जी ने मलप्पुरम जिला के तिरूर - परवण्णा जी.वी.एच.एस.एस में काम करते समय दसवीं कक्षा की मनुष्यता कविता का अनुवाद करने की कोशिश की हैं। आपको  हिंदीसोपान की ओर से बधाईयाँ।                         <<<<<  अनुवाद के लिए यहाँ दबाएँ  >>>>>>

1 comment:

  1. विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
    मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
    हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिये,
    नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
    यही पशु�प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी,
    उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
    उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
    तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
    अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।

    सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है वही;
    वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
    विरूद्धवाद बुद्ध का दया�प्रवाह में बहा,
    विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?
    अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,
    वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
    समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।
    परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी,
    अभी अमत्र्य�अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
    रहो न यों कि एक से न काम और का सरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    "मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है,
    पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
    फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है,
    परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
    अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

    चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
    विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
    घटे न हेल मेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
    अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
    तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

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